
मैथिली बनाम भोजपुरी
Maithili Banam Bhojpuri
क्लासिक और व्यावसायिक का फ़ैसला आख़िर करता कौन है?
जिस भाषा को दरबार मिला, वह शास्त्र कहलाई। जिसे नहीं मिला, वह फूहड़।
मिथिला की मैथिली को विद्यापति मिले, अभिजात्य शिल्प मिला, अपनी लिपि मिली और अकादमियों की मान्यता मिली। भोजपुर की भोजपुरी को मंच मिला, बाज़ार मिला, और साथ में एक शब्द भी मिला: फूहड़।
यह किताब उसी फ़ैसले की पड़ताल करती है। मगध की एक ही जड़ से निकली इन दो बहनों के बीच दीवार कब खड़ी हुई, किसने खड़ी की, और उसे टिकाए रखने में जनगणना, दरबार, विश्वविद्यालय और सिनेमा की क्या भूमिका रही।
आख़िरी सवाल पाठक के लिए है। क्लासिक और व्यावसायिक का फ़ैसला आख़िर करता कौन है?
The Full Jacket